काहे मनवा कचोटता
काहे मनवा कचोटऽता,
सोच-सोच के लोटऽता
माया मोह भरल दुनिया मे
जानऽता पर टोकऽता
काहे मनवा कचोटऽता
ज्ञान ज्ञान हम रटऽतानी,
बस्ता भर भर घोटऽतानी
अज्ञानता के पोटऽतानी,
खुद से खुद के चोटऽतानी
अइसन काहे होखऽता,
काहे मनवा कचोटऽता
एके एगो कारण बाटे,
ना गीता ज्ञान केहू बाटऽत बाटे
संस्कार ना पाटऽत बाटे,
मन मे मन ना आटत बाटे
एही से मन से मन टकराता,
भीतरे भीतरे मन बउराता ।
उदय शंकर प्रसाद

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