ना केहू से बैरी ,ना केहू से इयारी
मर गईले पे केहू देवे लकड़ी केहू देवे आटा
जियते मे केहू ना पूछलक ना लइका ना चाचा
बिना दवाई खासत रहे सारा जीवन कमा के
मर गईले पे सब कुछ होला छूटहा हाथ बटा के
कर्न विर के लइका समझे पुड़ी सब्जी चलाके
भीतरे भीतरे खुश बाटे सारा धन दबाके
गाव मुहल्ला सब आईल बा आज हांथ बटावे
जियते मे लकड़ी करे सारा दाव लगा के
केहू बोले कुत्ता निहर, केहू झार लगावे
काम रहे तऽ मीठ बतिया के सभे आपन काम चलावे
सीधा भईले के फायदा सभे खईचा भर उठईलक
आपन फायदा देख के लोग ओकरा से बतियइलख
जानत रहे सब कुछ लेकिन केहू के कुछ ना टरकइलक
रहे ज्ञानी बहुते लेकिन सबसे बुरबक बन बतीययिलक
धर्म अधर्म पे अउर सही गलत पे कईले रहे पलरा भारी
ना केहू से बैरी कईलक ना केहू से इयारी ।
उदय शंकर "प्रसाद"
भोजपुरी कविता खाली शब्दन के खेल ना हऽ, ई माटी से जुड़ल जिनगी के साँच-साँच भाव हऽ। एह में गाँव-देहात के महक, मेहनत-मजदूरी के पीड़ा, माई के ममता, प्रेम के मिठास आ विरह के कसक सजीव रूप में झलकेला। एही से भोजपुरी कविता पढ़ल ना, महसूस कइल जाला जेके कारण भोजपुरी कविता मन में गूंजत रहेला। हम आपन कविता बहुत सादा भाषा में गहिर भावना के अइसन ढंग से पिरोए के कोशिश कइले बानी कि कविता सीधे कविता पढ़े वाला के दिल में उतर जाए। हमार कविता बनावटी ना होके आम आदमी के अनुभव, लोकसंस्कृति आ समाज के सचाई के आईना हऽ।
रविवार, 1 जून 2025
ना केहू से बैरी ,ना केहू से इयारी
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1 टिप्पणी:
बहुत सुन्दर
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