द्रोपदी, सभा अउर कृष्ण
सब केहू सुतल रहे आंख खोल-खोल
सभे लागावे ठहाका बोल-बोल
बिच सभा मे एगो औरत
रोअत रहे हाथ जोर-जोर
जे सकुनी के पासा से रहे पलटाईल
ना चाचा ना केहू , केहू के ले आईल
ना दुलहा ना देवर आईल
तब नाम् हरी के जिहवा पे भाईल
का करस हरी बड़ा दयालु
रणनीति मे बडका चालू
लोक लाज सब उहे बचइने
बडका रिस्ता उहे निभइने
उदय शंकर प्रसाद
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1 टिप्पणी:
बहुत सुंदर
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