🙋सब के फुलईले चल चलऽ 🙋
सब के फुलईले चलऽ
धुल खुशी के उडईले चलऽ
कब, कहवा, कईसे रात हो जाई
जब ,जईसे ,जहवा जे मिले
प्यार् के भेट ओके बढईले चलऽ
का टिस, का रिस,
का खिस, का विस
दिल सगरो के जित
ना केहु के कबो दबईले चलऽ
प्यार् के ढिबरी जलईले चलऽ
भोजपुरी कविता खाली शब्दन के खेल ना हऽ, ई माटी से जुड़ल जिनगी के साँच-साँच भाव हऽ। एह में गाँव-देहात के महक, मेहनत-मजदूरी के पीड़ा, माई के ममता, प्रेम के मिठास आ विरह के कसक सजीव रूप में झलकेला। एही से भोजपुरी कविता पढ़ल ना, महसूस कइल जाला जेके कारण भोजपुरी कविता मन में गूंजत रहेला। हम आपन कविता बहुत सादा भाषा में गहिर भावना के अइसन ढंग से पिरोए के कोशिश कइले बानी कि कविता सीधे कविता पढ़े वाला के दिल में उतर जाए। हमार कविता बनावटी ना होके आम आदमी के अनुभव, लोकसंस्कृति आ समाज के सचाई के आईना हऽ।
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