सोमवार, 12 जनवरी 2026

मरद (Marad)

    




   भोजपुरी कविता " मरद"

ना घर मे गरज बा, ना बाहर मे गरज बा
मरद हई बस, मरद, भइल हि हरज बा

कबो मेहरी के गहना, कबो चउका के लहना
कबो लइकन के कहना, कबो सबके खेलवना

हई सबके उधारी, केहू कुछ ला पुकारी
हम सबके करज हई, हा हम गरज हई

कबो केहू के गारी, कबो घर के तरकारी
कबो मतलब के इयारी, ना कह के बीमारी

हई आशा के गगरी, ई मतलब के नगरी
"ना" ला हरज हई, हा हम गरज हई

कबो बन के चिंगारी  फूटी हारी-हारी
कबो हक मे कटी अउर बटी बारी-बारी

हई सगरन के सगरी ना देले पे झगड़ी
हर दवा के मरऽज हई हा हम गरज हई

कबो बन के भिखारी भटकी मारी- मारी
कबो थक के जे हारी ना घर ना दुआरी

हऽ जिंदगी जुआरी खेले पारा-पारी
हा सबके फरज हई हा हम गरज हई

कबो हमही हई गारी कबो खुद के हि मारी
कबो केहू धुतकरी ना समझे लाचारी

कटी बारी बारी अउर टूटी तारी तारी
हम "ना" ला हरज हई हा बस गरज हई

                         उदय शंकर प्रसाद

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